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विश्व का पहला श्री यंत्र, जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा 1008 ब्राह्मणों द्वारा एक साथ, एक ही अग्नि में, उज्जैन के पावन शिप्रा तट पर की गई है। इतिहास में पहली बार। श्री यंत्र कोई साधारण आभूषण नहीं, बल्कि स्वयं महालक्ष्मी का दिव्य ज्यामितीय स्वरूप है। यह वही यंत्र है, जिसके माध्यम से अगस्त्य ऋषि से लेकर आदि शंकराचार्य तक महान ऋषियों ने धन, वैभव और दैवी कृपा का आह्वान किया।परंतु यह समझना आवश्यक है - श्री यंत्र की शक्ति उसकी प्राण-प्रतिष्ठा पर निर्भर करती है। सिद्धि के बिना यह केवल धातु का एक टुकड़ा है, किंतु सिद्धि के साथ यह स्वयं महालक्ष्मी का साक्षात स्वरूप बन जाता है।
किसी भी मंदिर, मठ या पीठ में आज तक ऐसा नहीं हुआ कि 1008 ब्राह्मणों ने एक साथ, एक ही यज्ञ में किसी श्री यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा की हो।सामान्यतः 11, 21 या 51 ब्राह्मण ही सम्मिलित होते हैं।108 ब्राह्मणों का एकत्र होना भी अत्यंत दुर्लभ है । वैदिक परंपरा में 1008 ब्राह्मण ‘पूर्ण-सिद्धि’ का प्रतीक माने जाते हैं। आप केवल एक यंत्र नहीं प्राप्त कर रहे बल्कि आप सनातन इतिहास के एक अद्वितीय क्षण के सहभागी बन रहे हैं।
न कांची में, न श्रृंगेरी में, और न ही काशी में इतिहास में पहली बार 1008 ब्राह्मणों द्वारा एक ही यज्ञ में प्राण-प्रतिष्ठा।
दिव्य प्रसाद सदैव सीमित होता है। इसलिए 10,000 यंत्र- न अधिक, न कम।
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